लोकतंत्र में सोशल मीडिया को चौथे स्तंभ के रूप में माना जाता है, क्योंकि यही वह मंच है जहाँ आम जनता अपनी आवाज़ बिना रुकावट के उठा सकती है।
लेकिन बिहार की राजनीति में कई बार यह देखने को मिला है कि नेता सोशल मीडिया पर उठ रही सच्ची और कड़वी आवाज़ों को दबाने की कोशिश करते हैं।
कभी पोस्ट करने वालों पर कार्रवाई, कभी आलोचना करने वालों को धमकाना, और कभी ट्रोल आर्मी के ज़रिए दबाव बनाना – यह सब लोकतंत्र की उस भावना के खिलाफ है, जिसमें हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
जनता का कहना है कि अगर सोशल मीडिया की आवाज़ को ही दबा दिया जाएगा, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कमजोर पड़ जाएगा। अब समय आ गया है कि नेताओं को जनता की आवाज़ सुननी होगी, न कि उसे कुचलने की कोशिश करनी चाहिए।






